प्राकृतिक संसाधनों के सदुपयोग से देश का सम्पूर्ण विकास संभव.

दोस्तों नीचे जो मैं तस्वीर दिखा रहा हूँ वह मेरे गाँव तथा उसके अगल बगल के गांवों की है।आर्थिक किल्लत के कारण ज्यादातर किसान धान की रोपनी नहीं किए हैं। परंतु इसमें जो भी वनस्पति दिख रहा है वह औषधि बनाने के लिए काफ़ी उपयोगी है, परंतु इसकी जानकारी न ही लोगों को है न ही इसकेलिए बाज़ार की व्यवस्था है।इस प्रकार भारत कैसे विकास कर सकता है, जहाँ न प्राकृतिक सम्पदाओं का सम्मान होता है और न ही संरक्षण।



दुःख इस बात की अवश्य है की भारत की सरकार देश को विकसित बनाने के उद्देश्य से विदेशों का भ्रमण कर रही है. परन्तु उसका जो फायदा वाकई मिलाना चाहिए वह मिल नहीं रहा है.इस मद में प्रधानमंत्री से लेकर अन्य केन्द्रीय मंत्री की विदेश यात्रा पर करोरों रूपया खर्च हो चूका है.गौर तलब हो कि यात्रा में हुए सभी खर्च देश के एक-एक नागरिक की गाढ़ी कमाई का हिस्सा है. 

           देश को विकसित बनाने केलिए हमें दर-दर भटकने की जरूरत नहीं है. हमारे देश में संसाधनों की बिलकुल कमी नहीं है.जरुरत है,इसका अधिकाधिक उपयोग करने की.दिए गए चित्र परती खेत का है.परती खेत का मतलब होता है,वैसा खेत जिसमें फसल नहीं लगाया गया हो. इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं,जिसका सबसे बड़ा कारण है तकनीकी  साधन के अभाव में महँगी कृषि.            लेकिन इन सभी तस्वीरों को देखकर अस्पष्ट लग रहा है की भूमि काफी उपजाऊ है.
                                                  चरक मुनि के अनुसार दुनिया की कोई भी वैसी वनस्पति नहीं है,जिसका औषधीय इस्तेमाल नहीं किया जाता हो.कुछ का तो औषधीय उपयोग आम जनता जानती भी है,परन्तु ज्यादातर वनस्पति का उपयोग आयुर्वेदाचार एवं औषधि विशेसग्य जानते हैं.आयुर्वेदिक कंपनियों को यदि इस क्षेत्र में प्रोत्साहित किया जाए तो कंपनी एवं किसानों को लाभ के अच्छे अवसर प्राप्त हो सकता है.अतः यहाँ की सरकार को चाहिए की देश के विकास केलिए यहाँ के संसाधनों का भरपूर उपयोग करने एवं कराने की दिशा में पहल करें न की विदेश यात्रा में नाजायज़ पैसा खर्च करे.

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