राजनीतिक दलों द्वारा हरताल करने से निम्न वर्ग के लोगों को परेशानी
हड़ताल करने वाले गरीबों के मशीहा नहीं।
आज कल देश में राजनीतिक पार्टियाँ कुछ ज्यादा ही हड़ताल कर रही है।वे सभी जनता को न्याय दिलाने के लिए करते हैं, परंतु आम जनता के साथ जो कुछ भी नाइंसाफ़ी हो रही है इसका एहसास राजनीतिक दलों के आलाकमान को है कि नहीं,लेकिन आम जनता को तो है ही नहीं।इस कार्य से क्षति सरकारी सेवकों को तो बिल्कुल नहीं है,परंतु दिहाड़ी करने वाले मजदूर एवं छोटे-व्यसायियों को तो जरूर है. सरकारी सेवकों केलिए तोयह आराम फरमाने का एक बहाना है,परन्तु दिहारी करने वाले मजदूरों केलिए तो यह अभिशाप के बराबर
है.सोच कर देखिए कि ये गरीब मजदूर यदि एक दिन काम पर नहीं जाए तो उनका हरजाना मिल पाएगा.बिलकुल नहीं . ये राजनीतिक पार्टियाँ उनके इस समस्या पर कभी भी गौर नहीं फरमा सकती. विडम्बना तो यह है कि जिनके ऊपर कहर बरपाया जाता है,उन्हें भी ये सब बातें समझ में नहीं आती.जो कोई लोग हरताल का हिस्सा बने होते है. वहाँ उनका कोई न कोई निजी स्वार्थ होता है.यह मेरा मानना है. सच्चाई तो यह है कि इनके अंदर जरा सा भी देश भक्ति नहीं होती. यदि इनके अंदर लेशमात्र भी गरीबों ,दलितों
एवं शोषितों केलिए सहानुभूति होती तो वे हरताल कभी नहीं करते. हरताली कभी यह सोचे कि मेरे एक दिन के हरताल से रिक्शा चलाने वालों के ऊपर क्या बीता, चाय व सब्जी बेचने वालों के ऊपर क्या बीता.हद तो तब हो जाती है, जब प्रसव पीड़ा से कराहती कोई महिला या गंभीर बीमारी से ग्रस्त कोई व्यक्ति डॉक्टर के यहाँ जाने के क्रम में रास्ते में ही गाड़ी में दम तोड़ देता है. क्या अन्याय के खिलाफ इन हरतालियों की यही लड़ाई है,जिससे नुकसान उठाने वाला हर कोई व्यक्ति गरीब, दलित,शोषित व लाचार वर्ग के लोग ही हो . हमारे देश के पिछड़ेपन का सबसे बड़े कारणों में यह भी एक बड़ा कारण है. हम तो आम जनता से यह भी आग्रह करेंगे कि देश के विकास में वास्तविक भूमिका आपहिलोगों की है.अतः इन हरतालियों का एक जूट होकर सर्वथा विरोध करें. क्योंकि ये कभी भी गरीबों का मशीहा नहीं हो सकते. ये कुछ भी करते हैं अपने निजी स्वार्थ केलिए. यदि उन्हें गरीबों के प्रति जरा सा भी सहानुभूति होती तो वे कभी भी उनके रोजी-रोटी में खलल नहीं डालते. नवेन्दु नवीन (ब्लॉगर)
(यह मेरा व्यक्तिगत विचार है.)


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